करोड़ों की संपत्ति, परिवार से मिले उपहार और विभागीय कार्यशैली पर उठे गंभीर सवाल
लखनऊ। उत्तर प्रदेश के सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग के निदेशक विशाल सिंह एक बार फिर सुर्खियों में हैं। इस बार मामला उनकी कथित संपत्ति, विभागीय कार्यशैली और निर्णयों को लेकर उठे सवालों का है, जो अब शासन से लेकर राजनीतिक गलियारों तक चर्चा का विषय बन गया है।
संपत्ति का विवरण चर्चा में
कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DOPT) में दर्ज चल-अचल संपत्ति के विवरण के अनुसार, विशाल सिंह के पास नोएडा और वाराणसी में फ्लैट सहित कई स्थानों पर पैतृक जमीन दर्ज है।
बताया गया है कि वर्ष 2016 में नोएडा के सेक्टर-77 स्थित एक अपार्टमेंट में करीब 63.10 लाख रुपये का फ्लैट खरीदा गया, जबकि वर्ष 2018 में वाराणसी में भी इसी कीमत के आसपास एक अन्य फ्लैट लिया गया।इसके अलावा वाराणसी और जौनपुर में स्थित पैतृक जमीन की कीमत करोड़ों रुपये में बताई जा रही है। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है।
परिवार से करोड़ों की संपत्ति गिफ्ट
रिपोर्ट्स के मुताबिक, वर्ष 2025 में उनकी माता और भाई द्वारा वाराणसी के होलापुर क्षेत्र में करोड़ों रुपये मूल्य की जमीन उपहार (गिफ्ट) के रूप में दी गई। अलग-अलग दस्तावेजों में इन संपत्तियों का मूल्य लाखों से लेकर करोड़ों रुपये तक दर्शाया गया है, जिसने इस पूरे मामले को और चर्चित बना दिया है।
टेंडर प्रक्रिया पर उठे सवाल
सूचना विभाग में सोशल मीडिया और पीआर एजेंसियों के चयन को लेकर भी सवाल खड़े हुए हैं। सूत्रों का दावा है कि टेंडर प्रक्रिया को कई बार निरस्त किया गया और बाद में अधिक बजट पर एजेंसियों का चयन किया गया।
हालांकि, इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है और विभाग की ओर से इस पर कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
‘प्राइवेट ओएसडी’ का विवाद
विभागीय हलकों में यह भी चर्चा है कि एक निजी व्यक्ति, विनीत पाठक, को अनौपचारिक रूप से ओएसडी की तरह कार्य करते देखा गया। आरोप है कि वह कई सरकारी कार्यक्रमों में प्रतिनिधि के रूप में शामिल हुआ और विभागीय कार्यों में सक्रिय भूमिका निभाता रहा।
यह भी कहा जा रहा है कि संबंधित व्यक्ति को सरकारी सुविधाएं भी उपलब्ध कराई गईं। हालांकि, इस संबंध में भी कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हो सकी है।

मेंटरशिप को लेकर भी सवाल
बताया जाता है कि विशाल सिंह वाराणसी स्थित संत अतुलानंद रेजिडेंशियल एकेडमी से मेंटर के रूप में जुड़े हैं। इस भूमिका की आधिकारिक जानकारी संबंधित विभागों को दी गई थी या नहीं, इस पर भी सवाल उठ रहे हैं।
पक्ष जानने की कोशिश जारी
पूरे मामले में सूचना निदेशक विशाल सिंह से कई बार संपर्क करने की कोशिश की गई, लेकिन खबर लिखे जाने तक उनका पक्ष सामने नहीं आ सका। वहीं, उच्च अधिकारियों से भी इस संबंध में कोई प्रतिक्रिया नहीं मिल सकी है।
निष्कर्ष
यह पूरा मामला फिलहाल आरोपों और दावों के आधार पर चर्चा में है। इनकी निष्पक्ष जांच और आधिकारिक पुष्टि होना अभी बाकी है। प्रशासनिक पारदर्शिता और जवाबदेही के लिए जरूरी है कि संबंधित पक्ष सामने आकर स्थिति स्पष्ट करें, ताकि सच्चाई जनता के सामने आ सके।
(डिस्क्लेमर: यह खबर विभिन्न स्रोतों और उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर तैयार की गई है। इसमें लगाए गए आरोपों की आधिकारिक पुष्टि होना शेष है।)
